Sunday, October 10, 2021

Translation (English-Hindi) Exercise-39

 In the preamble to the Food Safety and Standards Act, 2006, the Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) is expected to ensure availability of safe and wholesome food for the people in India. Therefore, FSSAI has embarked on a large-scale effort to transform the country’s food system in order to ensure safe, healthy and sustainable food for all Indians through the ‘Eat Right India’ movement.The tagline ‘Sahi Bhojan. Behtar Jeevan’, thus, forms the foundation of this movement.

Eat Right India adopts a judicious mix of regulatory, capacity building, collaborative and empowerment approaches to ensure that our food is good both for the people and the planet. Further, it builds on the collective action of all stakeholders - the government, food businesses, civil society organizations, experts and professionals, development agencies and citizens at large.

Eat Right India adopts an integrative or ‘whole of the government’ approach since the movement brings together food-related mandates of the agriculture, health, environment and other ministries.

Furthermore, since foodborne illnesses and various diet-related diseases cut across all age groups and all sections of the society it also adopts a ‘whole of society’ approach, bringing all stakeholders together on a common platform.

Eat Right India is aligned to the National Health Policy 2017 with its focus on preventive and promotive healthcare and flagship programmes like Ayushman Bharat, POSHAN Abhiyaan, Anemia Mukt Bharat and Swacch Bharat Mission.

The Food Safety and Standards Authority of India (FSSAI) has been established under Food Safety and Standards , 2006 which consolidates various acts & orders that have hitherto handled food related issues in various Ministries and Departments. FSSAI has been created for laying down science based standards for articles of food and to regulate their manufacture, storage, distribution, sale and import to ensure availability of safe and wholesome food for human consumption.

Friday, January 10, 2020

हिंदी दिवस बनाम विश्‍व हिंदी दिवस


     विश्‍व में आर्थिक, सामाजिक, राजनीतिक, आध्‍यात्मिक, साहित्यिक दृष्टि से अग्रणी भारत में 14 सितंबर और 10 जनवरी का विशेष महत्‍व है। एक ओर जहाँ हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है तो वहीं दूसरी ओर 10 जनवरी को विश्‍व हिंदी दिवस मनाया जाता है। भारतीय संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत संघ की राजभाषा के रूप में अंगीकृत किया था जिसकी याद में हर साल हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है। नागपुर (महाराष्‍ट्र, भारत) में 10-12 जनवरी 1975 को प्रथम हिंदी विश्‍व सम्‍मेलन का आयोजन किया गया था जिसकी याद में 10 जनवरी को विश्‍व हिंदी दिवस का आयोजन किया जाता है।

हिंदी दिवस का मुख्‍य कार्यक्रम हर साल 14 सितंबर को विज्ञान भवन के भव्‍य सभागार में आयोजित किया जाता है। यह मुख्‍य कार्यक्रम राजभाषा विभाग, गृह मंत्रालय, भारत द्वारा आयोजित किया जाता है जिसमें माननीय राष्‍ट्रपति अथवा उपराष्‍ट्रपति, माननीय केंद्रीय गृह मंत्री एवं केंद्रीय गृह राज्‍य मंत्री और सचिव, राजभाषा विभाग मंच को सुशोभित करते हैं। विशिष्‍ट आमंत्रित अतिथियों के रूप में संसदीय राजभाषा समिति की तीनों उप-समितियों के माननीय सांसद सदस्‍यगण भाग लेते हैं। इस कार्यक्रम की प्रमुख गतिविधि सम्‍मानित मंच से गरिमामय संदेश होते हैं और राजभाषा विभाग द्वारा हर साल जारी किए जाने वाले वार्षिक कार्यक्रम के अनुरूप भारत सरकार में उत्‍कृष्‍ट कार्य करने वाले मंत्रालयों/विभागों/कार्यालयों/बैंकों/निगमों/बोर्डों आदि के वरिष्‍ठतम अधिकारियों को पुरस्‍कृत एवं सम्‍मानित किया जाता है। इसके साथ ही, उत्‍कृष्‍ट हिंदी पुस्‍तकों एवं हिंदी लेखों के लेखकों को पुरस्‍कृत एवं सम्‍मानित किया जाता है। इस सभागार में केंद्रीय सरकार के मंत्रालयों/विभागों/कार्यालयों के प्रतिनिधि के रूप में वरिष्‍ठ अधिकारीगण एवं राजभाषा कैडर से जुड़े अधिकारीगण/अनुवादकगण भाग लेते हैं। यह मुख्‍य कार्यक्रम बहुत ही औपचारिक एवं गरिमामय होता है।

उक्‍त मुख्‍य कार्यक्रम के अलावा भारत सरकार के सभी मंत्रालयों/ विभागों/कार्यालयों/विश्‍वविद्यालयों/महाविद्यालयों/विद्यालयों आदि के साथ-साथ विदेशों में स्थित भारतीय दूतावासों में हिंदी दिवस कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। इसके साथ ही, इनमें हिंदी दिवस के साथ-साथ हिंदी सप्‍ताह/पखवाड़ा/माह का आयोजन भी किया जाता है जिसमें विभिन्‍न हिंदी प्रतियोगिताओं/हिंदी कविता पाठ कार्यक्रमों आदि का आयोजन किया जाता है। यह सभी कार्यक्रम भी बहुत ही औपचारिक और गरिमामय होते हैं। 

विश्‍व हिंदी दिवस का सरकारी या गैर-सरकारी स्‍तर पर देश या विदेश में कोई मुख्‍य कार्यक्रम आयोजित किए जाने की परंपरा नहीं रही है। इस दिन देश-विदेश के हिंदी साहित्‍यकार तथा हिंदीप्रेमी व्‍यक्ति एवं संस्‍थाएँ स्‍वतंत्र रूप से बहुत-ही खूबसूरत एवं गरिमामय कार्यक्रमों का आयोजन करते हैं। इन कार्यक्रमों में हिंदी की हर विधा पर चर्चा-परिचर्चा होती है। हिंदी सिनेमा जगत भी इन कार्यक्रमों में विशेष रूचि दिखाता है। यदि विश्‍व हिंदी दिवस को देश-विदेश के हिंदीभाषियों, हिंदी-साधकों, हिंदी-साहित्‍यकारों, हिंदी-कलाकारों एवं हिंदी से जीविकोपार्जन करने वाले सभी महानुभावों के लिए बड़ा दिन (क्रिसमस) कहा जाए तो अतिश्‍योक्ति नहीं होगी। 

विश्‍व हिंदी दिवस कार्यक्रमों की श्रृंखला में, 10-11 जनवरी 2020 को विज्ञान भवन, नई दिल्‍ली, भारत के उसी विशाल एवं भव्‍य सभागार में हंसराज कॉलेज, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय द्वारा अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी सम्‍मेलन का आयोजन किया गया जिसमें हर साल मुख्‍य हिंदी दिवस कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है। इस सम्‍मेलन में देश-विदेश के अनेक हिंदी-साहित्‍यकारों/विद्यानों ने भाग लिया। हिंदी की अनमोल धरोहर को सहेजने वाली युवा पीढ़ी की उपस्थिति इस कार्यक्रम का मुख्‍य आकर्षण थी। इस भव्‍य सभागार में उपस्थित प्रत्‍येक हिंदीप्रेमी अपने को गौरवान्वित महसूस कर रहा था। चूंकि मैं इस भव्‍य सभागार में आयोजित अनेक हिंदी दिवस कार्यक्रमों का रसास्‍वादन कर चुका हूँ और अब इसी भव्‍य सभागार में विश्‍व हिंदी दिवस के अवसर पर आयोजित अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी सम्‍मेलन का रसपान भी किया है, इसलिए मैं यह कह सकता हूँ कि इस भव्‍य सभागार में आयोजित हिंदी दिवस एवं विश्‍व हिंदी दिवस कार्यक्रमों का अपना-अपना विशेष महत्‍व एवं स्‍थान है।

साल 2020 का विश्‍व हिंदी दिवस अनूठा दिखाई दे रहा है। एक ओर जहां, विज्ञान भवन से हिंदी की खास महक आई, वहीं अनेक संस्‍थाओं ने विश्‍व हिंदी दिवस को खास बनाने के लिए विशेष कार्यक्रम आयोजित किए हैं। मैं, यहां पर इंद्रप्रस्‍थ महिला महाविद्यालय, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय द्वारा 9-11 जनवरी 2020 को अपने सम्‍मेलन कक्ष में आयोजित हिंदी : वैश्विक परिप्रेक्ष्‍य-भाषा, साहित्‍य और अनुवाद विषयक अंतर्राष्‍ट्रीय हिंदी सम्‍मेलन का विशेष उल्‍लेख करना चाहूँगा। यह सम्‍मेलन न्‍यूयॉर्क विश्‍वविद्यालय, दक्षिण एशियाई भाषा कार्यक्रम एवं कोलंबिया विश्‍वविद्यालय, हिंदी-उर्दू भाषा कार्यक्रम के सहयोग से आयोजित किया गया। इस सम्‍मेलन में देश-विदेश के प्रकांड हिंदी-साहित्‍यकारों/विद्वानों एवं अनुवादविदों ने भाग लिया। इसके साथ ही, मैं विश्‍व हिंदी दिवस को मुंबई हिंदी पत्रकार संघ द्वारा आयोजित बॉलीवुड और हिंदी विषयक परिचर्चा और विश्‍व हिंदी अकादमी, मुंबई द्वारा आयोजित हिंदी की विकास यात्रा पर परिसंवाद एवं काव्‍य संध्‍या का भी उल्‍लेख करना चाहूँगा।  

देश-विदेश में हिंदी दिवस और विश्‍व हिंदी दिवस कार्यक्रमों का एकमात्र मुख्‍य उद्देश्‍य देश-विदेश में हिंदी भाषा का विकास एवं प्रचार-प्रसार करते हुए हिंदी को राष्‍ट्रभाषा एवं विश्‍वभाषा के रूप में सुशोभित करने के साथ-साथ हिंदी को संयुक्‍त राष्‍ट्र में आधिकारिक कामकाज की भाषा के रूप स्‍थापित करना है। हम सभी एक ही मंजिल के पथिक हैं इसलिए यदि हम संयुक्‍त प्रयास एवं परिश्रम करें तो मंजिल तक जल्‍दी और निश्चित रूप से पहुंच सकते हैं। इस दिशा में, भारत संघ के देश-विदेश स्थित कार्यालयों में राजभाषा हिंदी का नियमानुसार प्रयोग सुनिश्चित करने का दायित्‍व वहन करने वाली नोडल एजेंसी राजभाषा विभाग और विश्‍व हिंदी सम्‍मेलनों के माध्‍यम से देश-विदेश में हिंदी का प्रचार-प्रसार एवं हिंदी को संयुक्‍त राष्‍ट्र की आधिकारिक कामकाज की भाषा के रूप में स्‍थापित करने के लिए तत्‍परता से अग्रसर विदेश मंत्रालय, भारत सरकार को एक संयुक्‍त छत्र (अम्‍ब्रेला) तैयार करना चाहिए जिसमें भारत सरकार के राजभाषा कैडर के प्रतिनिधि, देश-विदेश के सुप्रसिद्ध हिंदी साहित्‍यकार एवं भाषाविदों के प्रतिनिधि, हिंदीसेवी सरकारी एवं गैर-सरकारी संस्‍थाओं के प्रतिनिधि, हिंदी प्रकाशकों के प्रतिनिधि, हिंदी सिनेमा एवं संगीत जगत के प्रतिनिधि, देश के विश्‍वविद्यालयों-महाविद्यालयों के हिंदी प्राध्‍यापकों-अध्‍यापकों के प्रतिनिधि, हिंदी आईटी जगत के प्रतिनिधि और देश-विदेश में हिंदी शिक्षा प्राप्‍त करने वाले विद्यार्थी वर्ग के प्रतिनिधि शामिल किए जाने चाहिएं।  

देश-विदेश के सभी हिंदीभाषियों, हिंदीप्रेमियों, हिंदी साहित्‍यकारों, हिंदी विद्वानों, हिंदी भाषाविदों, राजभाषा हिंदी कैडर के अधिकरियों/कर्मचारियों, हिंदी नाटककारों, हिंदी कवियों, हिंदी प्राध्‍यापकों-अध्‍यापकों, हिंदी प्रकाशकों, हिंदी के विद्यार्थियों/शोधार्थियों को विश्‍व हिंदी दिवस की हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं।   

- सुनील भुटानी
लेखक एवं अनुवादक
मोबाइल: 9868896503
ब्‍लॉग: http://rudrakshao.blogspot.com


Tuesday, September 1, 2015

भारतीय समाज की 'एकजुटता' का असली चेहरा ------

भारतीय समाज की 'एकजुटता' का असली चेहरा चुनावों में दिखाई देता है। लगभग सभी धर्म, संप्रदाय एवं समाज आदि अपना-अपना मंच सजाकर नेताओं को आमंत्रित कर खुश करते हैं। प्रत्‍येक कार्यक्रम में वे अपने-अपने समाज के लिए कुछ न कुछ चाहते हैं। यह कटु सत्‍य है कि हमारे देश के लोग अपने-अपने समाज को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं, सत्‍ता किसी भी समाज को अत्‍यधिक लाभ पहुंचाती है, इसलिए चुनावी मौसम का फायदा उठाया जाता है। केवल आर्थिक हित ही एकमात्र ऐसा प्रभावी कारक है जो विभिन्‍न समाजों को एक-दूसरे से जुड़े होने की 'झूठी' तस्‍वीर पेश करता है। 

Sunday, August 30, 2015

सूचना का अधिकार की ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि : राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्‍य में

सूचना का अधिकार की ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि  
(राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्‍य में)

भूमिका

·        यह स्‍वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे महत्‍वपूर्ण और उपयोगी कानून है।
·        यह एक सशक्‍त (अहिंसात्‍मक) गांधीवादी हथियार है।
·        यह कानून ‘’जनता का शासन, जनता के लिए, जनता के द्वारा’’ की अवधारणा को सफल बनाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है।
·        यह कानून सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है।
·        इस कानून ने प्रशासनिक व्‍यवस्‍था में निर्णय लेने की प्रक्रिया को पारदर्शी बना दिया है।
·        इस कानून ने विधानपालिका, कार्यपालिका और न्‍यायपालिका के कामकाज के प्रति लोगों के संदेहात्‍मक नज़रिये को सकारात्‍मक बनाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा की है।

 ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि : राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्‍य में

·        इस कानून मज़दूर किसान शक्ति संगठन (एम.के.एस.एल.) की क्रांतिकारी पहल का परिणाम है।
·        ग्रामीण भारत में न्‍यूनतम मज़दूरी और सरकारी बही-खातों में पारदर्शिता लाने की मजदूरों की मांग ने इस कानून को बनाने का आधार तैयार किया था।
·        मज़दूरों के इस  अभियान  को पढ़े-लिखे लोगों के स्‍वयंसेवी संगठनों ने आगे बढ़ाया।
·        वर्ष 1993 में ग्राहक शिक्षा और अनुसंधान परिषद् (सी.ई.आर.सी.), अहमदाबाद ने इस कानून का सर्वप्रथम मसौदा पेश किया था।
·        वर्ष 1996 में न्‍यायाधीश पी.बी. सावंत की अध्‍यक्षता वाली प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी इस कानून का एक मसौदा तत्‍कालीन केन्‍द्रीय सरकार के समक्ष पेश किया था।
·        न्‍यायाधीश सावंत की अध्‍यक्षता वाली प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा तैयार किए गए मसौदे को अपडेट करने के बाद इसका नाम एन.आई.आर.डी. फ्रीडम ऑफ इंफार्मेशन बिल, 1997 कर दिया गया था।
·        वर्ष 1997 में तत्‍कालीन केन्‍द्रीय सरकार ने सूचना की आज़ादी पर विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए श्री एच.डी. शौरी की अध्‍यक्षता में एक कार्य समूह का गठन किया गया था।
·        शौरी समिति की रिपोर्ट और विधेयक का मसौदा वर्ष 1997 में प्रकाशित किया गया था।
·        शौरी समिति द्वारा तैयार विधेयक के मसौदे को तत्‍कालीन केन्‍द्रीय सरकार की कैबिनेट बैठकों में पारित किया गया था, परन्‍तु संसद में पेश नहीं किया गया था।
·        इसी बीच, तत्‍कालीन केन्‍द्रीय शहरी विकास मंत्री श्री राम जेठमलानी ने देश के नागरिकों को अपने मंत्रालय की फाइलों का निरीक्षण करने और फोटोकॉपी प्राप्‍त करने का अधिकार देने के लिए एक आदेश जारी किया था। परन्‍तु, तत्‍कालीन कैबिनेट सचिव ने इस आदेश को लागू करने की अनुमति नहीं दी थी।
·        शौरी समिति द्वारा तैयार मसौदा विधेयक में कुछ बदलाव करके इसे सूचना की आज़ादी विधेयक, 2000’ नाम दिया गया था।
·        तत्‍कालीन केन्‍द्रीय सरकार ने मसौदा सूचना का आज़ादी विधेयक, 2000  गृह मंत्रालय की संसदीय स्‍थायी समिति को भेज दिया था।
·        गृह मंत्रालय की संसदीय स्‍थाई समिति ने जुलाई, 2001 में अपनी रिपोर्ट पेश करने से पहले सिविल सोसायटी के समूहों से विचार-विमर्श किया था।
·        ‘’राष्‍ट्रीय सूचना की आज़ादी विधेयक, 2000 संसद में वर्ष 2002 में प्रस्‍तुत किया गया था।
·        ‘’राष्‍ट्रीय सूचना की आज़ादी विधेयक, 2000 संसद में दिसम्‍बर, 2002 में  पारित किया गया था।
·        जनवरी, 2003 में महामहिम राष्‍ट्रपति ने ‘’सूचना की आज़ादी अधिनियम, 2002 रूप में इसे अपनी सहमति प्रदान कर दी थी।
·        यह अधिनियम प्रभावी होने की निश्चित तारीख तक अधिसूचित नहीं किए जाने की वज़ह से वास्‍तव में लागू नहीं किया जा सका था।
·        मई, 2004 में केन्‍द्रीय सरकार में सत्‍ता परिवर्तन हुआ और एन.डी.ए. (नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस) की जगह यू.पी.ए. (यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस) की सरकार अस्तित्‍व में आ गई थी।
·        सूचना के अधिकार को यू.पी.ए. सरकार के न्‍यूनतम सांझा कार्यक्रम (कॉमन मिनिमम प्रोग्राम) में शामिल किया गया था।
·        तत्‍कालीन यू.पी.ए. सरकार के न्‍यूनतम सांझा कार्यक्रम के कार्यान्‍वयन की देखरेख के लिए नेशनल एडवाइज़री काउंसिल (एन.ए.सी.) का गठन किया गया था।
·        एन.ए.सी. की पहली बैठक में ही सूचना का अधिकार कानून को अंतिम  रूप देने की क़वायद शुरू कर दी गई थी।
·        इसी बीच,  सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने ‘’नागरिक के सूचना के अधिकार पर राष्‍ट्रीय अभियान (एन.सी.पी.आर.आई.) की ओर से एक माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय में जनहित याचिका दायर करते हुए ‘’सूचना की आज़ादी अधिनियम, 2002’’ को तत्‍काल लागू किए जाने की मांग की गई थी।
·        माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने इस मामले में केन्‍द्र सरकार को उसका जवाब दाखिल करने के लिए दिनांक 15 सितम्‍बर 2004 तक का समय दिया गया था।
·        इसी बीच, एन.ए.सी. ने दिनांक 14 अगस्‍त 2005 को आयोजित अपनी तीसरी बैठक में ‘’सूचना की आज़ादी अधिनियम, 2002’’ को संशोधित करने संबंधी अंतिम सिफ़ारिशों पर अपनी सहमति व्‍यक्‍त कर दी थी।
·        तत्‍पश्‍चात, एन.ए.सी. ने यह संशोधित विधेयक प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज दिया गया था।
·        23 दिसम्‍बर 2004 को ‘’सूचना का अधिकार विधेयक, 2004’’ संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में पेश किया गया था।
·        संसद ने यह विधेयक कार्मिक, जन शिकायत, विधि एवं अधिकारिता मंत्रालय की स्‍थायी समिति को विचार के लिए भेज दिया था।
·        इस स्‍थायी समिति की रिपोर्ट और प्रस्‍तावित संशोधित पाठ के साथ ‘’सूचना का अधिकार विधेयक, 2004’’ दिनांक 21 मार्च 2005 को लोकसभा को भेज दिया गया था।
·        सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक, 2005 दिनांक 10 मई 2005 को लोकसभा में पेश किया गया था।   
·        आखिरकार, यह विधेयक लोकसभा ने दिनांक 11 मई 2005 और राज्‍यसभा ने 12 मई 2005 को  अनुमोदित कर दिया था।
·        तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति ए.पी.जे. अब्‍दुल कलाम ने 15 जून 2005 को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005  पर अपनी मोहर लगा दी थी।
·        केंद्रीय सरकार और राज्‍य सरकारों को यह अधिनियम पूरी तरह से लागू करने के लिए 120 दिनों का समय दिया गया था।
·        यह अधिनियम 12 अक्‍तूबर 2005 से औपचारिक रूप से जम्‍मू एवं कश्‍मीर को छोड़कर शेष भारत पर लागू किया गया था।
·        जम्‍मू एवं कश्‍मीर राज्‍य में राज्‍य विधान सभा द्वारा 5 जनवरी 2004 को पारित जम्‍मू एवं कश्‍मीर सूचना का अधिकार कानून, 2004 लागू है।

 ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि : अंतर्राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्‍य में

·        वर्तमान में, विश्‍व के लगभग 75 देशों में भारत के आरटीआई कानून से मिलता-जुलता सूचना का अधिकार कानून अस्तित्‍व में है।
·        वर्ष 1990 में विश्‍व के केवल 13 देशों में इस तरह का कानून था।
·        भारत के पड़ोसी  देश नेपाल में यह कानून सूचना का अधिकार अधिनियम, 2064 (सम्‍वत् वर्ष) (वर्ष 2007) रूप में लागू किया गया है।
·        सूचना का अधिकार कानून अलग-अलग देशों में अलग-अलग नामों से प्रचलित हैं, जैसे –
-    दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र में प्रोमोशन ऑफ एक्‍सेस टू इंफर्मेशन एक्‍ट, 2000
-    ऑस्‍ट्रलिया में फ्रीडम ऑफ इंफर्मेशन एक्‍ट, 1982
-    जापान में लॉ कंसर्निंग टू इंफर्मेशन हेल्‍ड बाइ एडमिनिस्‍ट्र‍ेटिव आर्गेनाइजेशन्‍स, 1999
-    जमैका में एक्‍सेस टू इंफर्मेशन एक्‍ट, 2002
-    नार्वे में पब्लिक एक्‍सेस टू डॉक्‍यूमेंट इन पब्लिक एडमिनिस्ट्रिेशन एक्‍ट, 1970
·        कई अंतर्राष्‍ट्रीय संस्‍थाओं  जैसे – संयुक्‍त राष्‍ट्र (यू.एन.), अमेरिकी राज्‍यों के संगठन (ओ..एस.), यूरोपीय परिषद (सी.ई.) और अफ्रीकन यूनियन (ए.यू.) ने सूचना को स्‍वतंत्रता के अधिकार के मौलिक और कानूनी रूप को प्राधिकृत रूप से स्‍वीकार किया है।
·        अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका में मानवाधिकारों की सभी तीन प्रमुख प्रणालियों ने सूचना का अधिकार के महत्‍व को औपचारिक रूप से मानवाधिकार के रूप में स्‍वीकार किया है।

·        वर्ष 2006 में एक महत्‍वपूर्ण मामले में, अंतर्राष्‍ट्रीय न्‍यायालय, अंतर-अमेरिकी मानवाधिकार न्‍यायालय द्वारा पहला ऐसा निर्णय दिया गया था कि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता (राइट टू एक्‍सप्रेस) के अधिकार में सार्वजनिक संस्‍थाओं के पास उपलब्‍ध सूचना प्राप्‍त करने का अधिकार शामिल है। 

राष्‍ट्रभाषा एवं राजभाषा हिंदी : चुनौतियाँ एवं समाधान

राष्‍ट्रभाषा एवं राजभाषा हिंदी : चुनौतियाँ एवं समाधान

·        राष्‍ट्र एवं राष्‍ट्रभाषा तथा राजभाषा के प्रति सम्‍मान एवं गौरव की भावना का अभाव।
·        अंग्रेज़ों के शासनकाल की फाइलों में लिखित अंग्रेज़ी टिप्‍पण एवं पत्रों की भाषा का अंधानुकरण।
·        अंग्रेज़ों के शासनकाल में अंग्रेज़ी में तैयार किए गए नियमों, विनियमों, अधिनियमों आदि का वर्तमान में भी निरन्‍तर प्रयोग।
·        मौलिक लेखन की कला का अभाव।
·        राजभाषा हिंदी का अनुवाद आधारित होना।
·        पारिभाषिक शब्‍दों का बनावटीपन।
·        राजभाषा हिंदी के प्रयोग संबंधी सरकारी आदेशों/निर्देशों के अनुपालन के प्रति उदासीनता।
·        आम आदमी की शासन के प्रति भाषिक अकांक्षाओं को नज़रअंदाज करना।
·        सरकार और जनता के बीच संवादहीनता का प्रमुख कारण प्रशासनिक भाषा है।
·        राजभाषा हिंदी में कार्य करने के लिए प्रशिक्षण एवं अभ्‍यास।
·        सरकारी कार्यालयों में बातचीत राजभाषा हिंदी में लेकिन कामकाज अंग्रेज़ी में।
·        प्रशासनिक भाषा का तकनीकी होना।
·        कार्यालय में राजभाषा संबंधी पदों का अभाव।
·        सरकारी अधिकारियों/कर्मचारियों को राजभाषा-नीति के प्रावधानों का पर्याप्‍त ज्ञान नहीं होना।
·        वरिष्‍ठ अधिकारियों द्वारा अपने अधीनस्‍थ अधिकारियों/कर्मचारियों को हिंदी में कार्य करने के प्रति प्रेरित एवं प्रोत्‍साहित करने में उदासीनता बरतना।
·        राजभाषा हिंदी के प्रति विद्वेश का भाव होना।
·        राजभाषा हिंदी को सहज रूप मे विकसित करने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले अनुवादकों को प्रशिक्षण का अभाव।
·        आशुलिपिकों और टाइपिस्‍टों को हिंदी आशुलेखन और टाइपिंग का प्रशिक्षण।
·        हिंदी आशुलेखन और हिंदी टाइपिंग के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों का सदुपयोग।
·        राजभाषा हिंदी का मौजूदा स्‍वरूप अकुशलतापूर्वक अनुवाद का परिणाम है।
·        कंप्‍यूटरों पर हिंदी में कार्य करने की असुविधाजनक स्थिति।
·        हिंदी में प्रवीणता प्राप्‍त अधिकारियों/कर्मचारियों द्वारा हिंदी में कार्य करने के प्रति उदासीनता।
·        राजभाषा-नीति कार्यान्‍वयन की स्थिति की नियमित समीक्षा।
·        स्‍तरीय और उपयोगी हिंदी पुस्‍तकों/शब्‍दकोशों/शब्‍दावलियों आदि का अभाव।
·        राजभाषा हिंदी के प्रगामी प्रयोग संबंधी तिमाही/छमाही/वार्षिक रिपोर्ट तैयार करना।
·        संसदीय राजभाषा समिति की निरीक्षण प्रश्‍नावली तैयार करना।
·        हिंदी दिवस/सप्‍ताह/पखवाड़ा/माह का सफल आयोजन।

·        राजभाषा नीति के कार्यान्‍वयन में जानबूझकर असहयोग करने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों के लिए किसी दंड का प्रावधान नहीं होना। 

हिंदी की तथ्‍यात्‍मक स्थिति

हिंदी की तथ्‍यात्‍मक स्थिति

·        हिंदी भारत देश की लोक-स्‍वीकृत राष्‍ट्रभाषा है।
·        हिंदी भारत की संवैधानिक राजभाषा है।
·        विश्‍व के लोग हिंदी को भारत की राष्‍ट्रभाषा एवं राजभाषा के रूप में जानते और मानते हैं।
·        हिंदी चीन की मंदेरियन (चीनी) भाषा के बाद विश्‍व में सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली एवं समझी जाने वाली भाषा है।
·        हिंदी देश के अधिकांश लोगों की मातृभाषा और परस्‍पर-संवाद की भाषा है।
·        हिंदी संयुक्‍त राष्‍ट्र संघ की आधिकारिक भाषा बनने के लिए प्रबल दावेदार है।
·        विश्‍व का कोई भी व्‍यक्ति केवल हिंदी भाषा बोल एवं समझ कर भी भारतीय सभ्‍यता एवं संस्‍कृति को समझ सकता है।
·        स्‍वतंत्रता से पहले और बाद में सभी महान स्‍वतंत्रता सेनानियों ने हिंदी को ही भारत की राष्‍ट्रभाषा एवं राजभाषा बनाए जाने की अपील और समर्थन किया था।
·        देश के सभी क्षेत्रों के प्रतिनिधियों की भारतीय संविधान सभा ने बहुमत से हिंदी को भारत संघ की राजभाषा का दर्जा दिया था।  
·        हिंदी एवं हिंदीत्‍तर सभी भाषा-भाषियों के लिए हिंदी राष्‍ट्रभाषा एवं राजभाषा है।
·        हिंदी सिनेमा एवं संगीत के दीवाने विश्‍वभर में हैं।
·        हिंदी विज्ञापनों और हिंदी शब्‍दों का तड़का लगे विज्ञापनों की धूम है।
·        देश के अधिकांश लोग आध्‍यात्मिक ज्ञान हिंदी में ही प्राप्‍त करते हैं।
·        राजनेताओं द्वारा आम भारतीयों के दिलों-दिमाग तक पहुंचने की भाषा हिंदी है।
·        सत्‍ता के शीर्ष तक पहुंचने की भाषा है हिंदी।
·        फेसबुक, टिवट्टर, वट्स अप पर मशहूर होने की भाषा है हिंदी।
·        घर-परिवार एवं समाज से जुड़े रहने की भाषा है हिंदी।
·        कारोबारियों द्वारा नोट कमाने की भाषा है हिंदी।
·        आज़ादी के तरानों की भाषा है हिंदी।

·        मनोरंजन की भाषा है हिंदी।