भारतीय समाज की 'एकजुटता' का असली चेहरा चुनावों में दिखाई देता है। लगभग सभी धर्म, संप्रदाय एवं समाज आदि अपना-अपना मंच सजाकर नेताओं को आमंत्रित कर खुश करते हैं। प्रत्येक कार्यक्रम में वे अपने-अपने समाज के लिए कुछ न कुछ चाहते हैं। यह कटु सत्य है कि हमारे देश के लोग अपने-अपने समाज को आगे बढ़ाने में लगे हुए हैं, सत्ता किसी भी समाज को अत्यधिक लाभ पहुंचाती है, इसलिए चुनावी मौसम का फायदा उठाया जाता है। केवल आर्थिक हित ही एकमात्र ऐसा प्रभावी कारक है जो विभिन्न समाजों को एक-दूसरे से जुड़े होने की 'झूठी' तस्वीर पेश करता है।
Tuesday, September 1, 2015
Sunday, August 30, 2015
सूचना का अधिकार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में
सूचना का अधिकार की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
(राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में)
भूमिका
·
यह स्वतंत्र भारत के इतिहास
में सबसे महत्वपूर्ण और उपयोगी कानून है।
·
यह एक सशक्त (अहिंसात्मक)
गांधीवादी हथियार है।
·
यह कानून ‘’जनता का शासन, जनता के लिए,
जनता के द्वारा’’ की अवधारणा को सफल बनाने में महत्वपूर्ण
भूमिका अदा कर रहा है।
·
यह कानून सरकार को जनता के
प्रति जवाबदेह बनाता है।
·
इस कानून ने प्रशासनिक व्यवस्था
में निर्णय लेने की प्रक्रिया को पारदर्शी बना दिया है।
·
इस कानून ने विधानपालिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कामकाज के प्रति लोगों के संदेहात्मक
नज़रिये को सकारात्मक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि : राष्ट्रीय
परिप्रेक्ष्य में
·
इस कानून ‘मज़दूर किसान शक्ति संगठन (एम.के.एस.एल.)’ की
क्रांतिकारी पहल का परिणाम है।
·
ग्रामीण भारत में न्यूनतम
मज़दूरी और सरकारी बही-खातों में पारदर्शिता लाने की मजदूरों की मांग ने इस कानून
को बनाने का आधार तैयार किया था।
·
मज़दूरों के इस अभियान
को पढ़े-लिखे लोगों के स्वयंसेवी संगठनों ने आगे बढ़ाया।
·
वर्ष 1993 में ग्राहक शिक्षा
और अनुसंधान परिषद् (सी.ई.आर.सी.), अहमदाबाद ने
इस कानून का सर्वप्रथम मसौदा पेश किया था।
·
वर्ष 1996 में न्यायाधीश
पी.बी. सावंत की अध्यक्षता वाली प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी इस कानून का एक
मसौदा तत्कालीन केन्द्रीय सरकार के समक्ष पेश किया था।
·
न्यायाधीश सावंत की अध्यक्षता
वाली प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा तैयार किए गए मसौदे को अपडेट करने के बाद
इसका नाम एन.आई.आर.डी. फ्रीडम ऑफ इंफार्मेशन बिल, 1997 कर दिया गया था।
·
वर्ष 1997 में तत्कालीन केन्द्रीय
सरकार ने सूचना की आज़ादी पर विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए श्री एच.डी. शौरी
की अध्यक्षता में एक कार्य समूह का गठन किया गया था।
·
शौरी समिति की रिपोर्ट और
विधेयक का मसौदा वर्ष 1997 में प्रकाशित किया गया था।
·
शौरी समिति द्वारा तैयार
विधेयक के मसौदे को तत्कालीन केन्द्रीय सरकार की कैबिनेट बैठकों में पारित किया
गया था, परन्तु संसद में पेश नहीं किया गया था।
·
इसी बीच, तत्कालीन केन्द्रीय शहरी विकास मंत्री श्री राम जेठमलानी ने देश के
नागरिकों को अपने मंत्रालय की फाइलों का निरीक्षण करने और फोटोकॉपी प्राप्त करने
का अधिकार देने के लिए एक आदेश जारी किया था। परन्तु, तत्कालीन
कैबिनेट सचिव ने इस आदेश को लागू करने की अनुमति नहीं दी थी।
·
शौरी समिति द्वारा तैयार
मसौदा विधेयक में कुछ बदलाव करके इसे ‘सूचना की
आज़ादी विधेयक, 2000’ नाम दिया गया था।
·
तत्कालीन केन्द्रीय सरकार
ने मसौदा ‘सूचना का आज़ादी विधेयक, 2000’ गृह
मंत्रालय की संसदीय स्थायी समिति को भेज दिया था।
·
गृह मंत्रालय की संसदीय स्थाई
समिति ने जुलाई, 2001 में अपनी
रिपोर्ट पेश करने से पहले सिविल सोसायटी के समूहों से विचार-विमर्श किया था।
·
‘’राष्ट्रीय सूचना की
आज़ादी विधेयक, 2000’ संसद में वर्ष
2002 में प्रस्तुत किया गया था।
·
‘’राष्ट्रीय सूचना की
आज़ादी विधेयक, 2000’ संसद में दिसम्बर, 2002 में पारित किया गया था।
·
जनवरी, 2003 में महामहिम राष्ट्रपति ने ‘’सूचना की आज़ादी
अधिनियम, 2002’ रूप में इसे अपनी सहमति
प्रदान कर दी थी।
·
यह अधिनियम प्रभावी होने की
निश्चित तारीख तक अधिसूचित नहीं किए जाने की वज़ह से वास्तव में लागू नहीं किया
जा सका था।
·
मई, 2004 में केन्द्रीय सरकार में सत्ता परिवर्तन हुआ और एन.डी.ए. (नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस) की जगह यू.पी.ए.
(यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस) की सरकार अस्तित्व में आ गई थी।
·
सूचना के अधिकार को यू.पी.ए.
सरकार के न्यूनतम सांझा कार्यक्रम (कॉमन मिनिमम प्रोग्राम) में शामिल किया गया
था।
·
तत्कालीन यू.पी.ए. सरकार के न्यूनतम सांझा कार्यक्रम के कार्यान्वयन की देखरेख के
लिए नेशनल एडवाइज़री काउंसिल (एन.ए.सी.) का गठन किया गया था।
·
एन.ए.सी. की पहली बैठक में ही
सूचना का अधिकार कानून को अंतिम रूप देने
की क़वायद शुरू कर दी गई थी।
·
इसी बीच, सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने ‘’नागरिक के सूचना के अधिकार पर राष्ट्रीय अभियान (एन.सी.पी.आर.आई.) की ओर
से एक माननीय उच्चतम न्यायालय में जनहित याचिका दायर करते हुए ‘’सूचना की आज़ादी अधिनियम, 2002’’ को तत्काल लागू किए जाने की मांग की गई थी।
·
माननीय उच्चतम न्यायालय ने
इस मामले में केन्द्र सरकार को उसका जवाब दाखिल करने के लिए दिनांक 15 सितम्बर
2004 तक का समय दिया गया था।
·
इसी बीच, एन.ए.सी. ने दिनांक 14 अगस्त 2005 को आयोजित अपनी तीसरी बैठक में ‘’सूचना की आज़ादी अधिनियम, 2002’’ को संशोधित करने संबंधी अंतिम सिफ़ारिशों पर अपनी सहमति व्यक्त कर दी
थी।
·
तत्पश्चात, एन.ए.सी. ने यह संशोधित विधेयक प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज दिया गया
था।
·
23 दिसम्बर 2004 को ‘’सूचना का अधिकार विधेयक, 2004’’ संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में पेश किया गया था।
·
संसद ने यह विधेयक कार्मिक, जन शिकायत, विधि एवं अधिकारिता मंत्रालय की स्थायी
समिति को विचार के लिए भेज दिया था।
·
इस स्थायी समिति की रिपोर्ट
और प्रस्तावित संशोधित पाठ के साथ ‘’सूचना का
अधिकार विधेयक, 2004’’ दिनांक 21 मार्च
2005 को लोकसभा को भेज दिया गया था।
·
सूचना का अधिकार संशोधन
विधेयक, 2005 दिनांक 10 मई 2005 को लोकसभा में पेश
किया गया था।
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आखिरकार, यह विधेयक लोकसभा ने दिनांक 11 मई 2005 और राज्यसभा ने 12 मई 2005
को अनुमोदित कर दिया था।
·
तत्कालीन राष्ट्रपति ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने 15 जून 2005 को ‘सूचना का
अधिकार अधिनियम, 2005’ पर अपनी मोहर लगा दी थी।
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केंद्रीय सरकार और राज्य
सरकारों को यह अधिनियम पूरी तरह से लागू करने के लिए 120 दिनों का समय दिया गया
था।
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यह अधिनियम 12 अक्तूबर 2005
से औपचारिक रूप से जम्मू एवं कश्मीर को छोड़कर शेष भारत पर लागू किया गया था।
·
जम्मू एवं कश्मीर राज्य
में राज्य विधान सभा द्वारा 5 जनवरी 2004 को पारित ‘जम्मू एवं कश्मीर सूचना का अधिकार कानून, 2004’ लागू है।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि :
अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में
·
वर्तमान में, विश्व के लगभग 75 देशों में भारत के आरटीआई कानून से मिलता-जुलता सूचना
का अधिकार कानून अस्तित्व में है।
·
वर्ष 1990 में विश्व के केवल
13 देशों में इस तरह का कानून था।
·
भारत के पड़ोसी देश नेपाल में यह कानून ‘सूचना का अधिकार अधिनियम, 2064’ (सम्वत् वर्ष) (वर्ष 2007) रूप में लागू किया गया है।
·
सूचना का अधिकार कानून
अलग-अलग देशों में अलग-अलग नामों से प्रचलित हैं, जैसे –
- दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र में ‘प्रोमोशन ऑफ
एक्सेस टू इंफर्मेशन एक्ट, 2000’
- ऑस्ट्रलिया में ‘फ्रीडम ऑफ इंफर्मेशन एक्ट, 1982’
- जापान में ‘लॉ कंसर्निंग टू इंफर्मेशन हेल्ड बाइ
एडमिनिस्ट्रेटिव आर्गेनाइजेशन्स, 1999’
- जमैका में ‘एक्सेस टू इंफर्मेशन एक्ट, 2002’
- नार्वे में ‘पब्लिक एक्सेस टू डॉक्यूमेंट इन पब्लिक एडमिनिस्ट्रिेशन
एक्ट, 1970’
·
कई अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं
जैसे – संयुक्त राष्ट्र (यू.एन.), अमेरिकी राज्यों के संगठन (ओ.ए.एस.), यूरोपीय परिषद (सी.ई.) और अफ्रीकन यूनियन
(ए.यू.) ने सूचना को स्वतंत्रता के अधिकार के मौलिक और कानूनी रूप को प्राधिकृत
रूप से स्वीकार किया है।
·
अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका में मानवाधिकारों की सभी तीन प्रमुख प्रणालियों ने
सूचना का अधिकार के महत्व को औपचारिक रूप से मानवाधिकार के रूप में स्वीकार किया
है।
·
वर्ष 2006 में एक महत्वपूर्ण
मामले में, अंतर्राष्ट्रीय न्यायालय, अंतर-अमेरिकी मानवाधिकार न्यायालय द्वारा पहला ऐसा निर्णय दिया गया था
कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (राइट टू एक्सप्रेस) के अधिकार में सार्वजनिक संस्थाओं
के पास उपलब्ध सूचना प्राप्त करने का अधिकार शामिल है।
राष्ट्रभाषा एवं राजभाषा हिंदी : चुनौतियाँ एवं समाधान
राष्ट्रभाषा एवं राजभाषा
हिंदी : चुनौतियाँ एवं समाधान
·
राष्ट्र एवं राष्ट्रभाषा
तथा राजभाषा के प्रति सम्मान एवं गौरव की भावना का अभाव।
·
अंग्रेज़ों के शासनकाल की
फाइलों में लिखित अंग्रेज़ी टिप्पण एवं पत्रों की भाषा का अंधानुकरण।
·
अंग्रेज़ों के शासनकाल में
अंग्रेज़ी में तैयार किए गए नियमों, विनियमों, अधिनियमों आदि का वर्तमान में भी निरन्तर प्रयोग।
·
मौलिक लेखन की कला का अभाव।
·
राजभाषा हिंदी का अनुवाद
आधारित होना।
·
पारिभाषिक शब्दों का
बनावटीपन।
·
राजभाषा हिंदी के प्रयोग
संबंधी सरकारी आदेशों/निर्देशों के अनुपालन के प्रति उदासीनता।
·
आम आदमी की शासन के प्रति भाषिक
अकांक्षाओं को नज़रअंदाज करना।
·
सरकार और जनता के बीच
संवादहीनता का प्रमुख कारण प्रशासनिक भाषा है।
·
राजभाषा हिंदी में कार्य करने
के लिए प्रशिक्षण एवं अभ्यास।
·
सरकारी कार्यालयों में बातचीत
राजभाषा हिंदी में लेकिन कामकाज अंग्रेज़ी में।
·
प्रशासनिक भाषा का तकनीकी
होना।
·
कार्यालय में राजभाषा संबंधी
पदों का अभाव।
·
सरकारी
अधिकारियों/कर्मचारियों को राजभाषा-नीति के प्रावधानों का पर्याप्त ज्ञान नहीं
होना।
·
वरिष्ठ अधिकारियों द्वारा
अपने अधीनस्थ अधिकारियों/कर्मचारियों को हिंदी में कार्य करने के प्रति प्रेरित
एवं प्रोत्साहित करने में उदासीनता बरतना।
·
राजभाषा हिंदी के प्रति
विद्वेश का भाव होना।
·
राजभाषा हिंदी को सहज रूप मे
विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले अनुवादकों को प्रशिक्षण का
अभाव।
·
आशुलिपिकों और टाइपिस्टों को
हिंदी आशुलेखन और टाइपिंग का प्रशिक्षण।
·
हिंदी आशुलेखन और हिंदी
टाइपिंग के लिए प्रशिक्षित कर्मचारियों का सदुपयोग।
·
राजभाषा हिंदी का मौजूदा स्वरूप
अकुशलतापूर्वक अनुवाद का परिणाम है।
·
कंप्यूटरों पर हिंदी में
कार्य करने की असुविधाजनक स्थिति।
·
हिंदी में प्रवीणता प्राप्त
अधिकारियों/कर्मचारियों द्वारा हिंदी में कार्य करने के प्रति उदासीनता।
·
राजभाषा-नीति कार्यान्वयन की
स्थिति की नियमित समीक्षा।
·
स्तरीय और उपयोगी हिंदी पुस्तकों/शब्दकोशों/शब्दावलियों
आदि का अभाव।
·
राजभाषा हिंदी के प्रगामी
प्रयोग संबंधी तिमाही/छमाही/वार्षिक रिपोर्ट तैयार करना।
·
संसदीय राजभाषा समिति की
निरीक्षण प्रश्नावली तैयार करना।
·
हिंदी दिवस/सप्ताह/पखवाड़ा/माह
का सफल आयोजन।
·
राजभाषा नीति के कार्यान्वयन
में जानबूझकर असहयोग करने वाले अधिकारियों/कर्मचारियों के लिए किसी दंड का
प्रावधान नहीं होना।
हिंदी की तथ्यात्मक स्थिति
हिंदी की तथ्यात्मक स्थिति
·
हिंदी भारत देश की लोक-स्वीकृत
राष्ट्रभाषा है।
·
हिंदी भारत की संवैधानिक
राजभाषा है।
·
विश्व के लोग हिंदी को भारत
की राष्ट्रभाषा एवं राजभाषा के रूप में जानते और मानते हैं।
·
हिंदी चीन की मंदेरियन (चीनी)
भाषा के बाद विश्व में सबसे अधिक लोगों द्वारा बोली एवं समझी जाने वाली भाषा है।
·
हिंदी देश के अधिकांश लोगों
की मातृभाषा और परस्पर-संवाद की भाषा है।
·
हिंदी संयुक्त राष्ट्र संघ
की आधिकारिक भाषा बनने के लिए प्रबल दावेदार है।
·
विश्व का कोई भी व्यक्ति
केवल हिंदी भाषा बोल एवं समझ कर भी भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति को समझ सकता है।
·
स्वतंत्रता से पहले और बाद
में सभी महान स्वतंत्रता सेनानियों ने हिंदी को ही भारत की राष्ट्रभाषा एवं
राजभाषा बनाए जाने की अपील और समर्थन किया था।
·
देश के सभी क्षेत्रों के
प्रतिनिधियों की भारतीय संविधान सभा ने बहुमत से हिंदी को भारत संघ की राजभाषा का
दर्जा दिया था।
·
हिंदी एवं हिंदीत्तर सभी
भाषा-भाषियों के लिए हिंदी राष्ट्रभाषा एवं राजभाषा है।
·
हिंदी सिनेमा एवं संगीत के
दीवाने विश्वभर में हैं।
·
हिंदी विज्ञापनों और हिंदी
शब्दों का तड़का लगे विज्ञापनों की धूम है।
·
देश के अधिकांश लोग आध्यात्मिक
ज्ञान हिंदी में ही प्राप्त करते हैं।
·
राजनेताओं द्वारा आम भारतीयों
के दिलों-दिमाग तक पहुंचने की भाषा हिंदी है।
·
सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने
की भाषा है हिंदी।
·
फेसबुक, टिवट्टर, वट्स अप पर मशहूर होने की भाषा है हिंदी।
·
घर-परिवार एवं समाज से जुड़े
रहने की भाषा है हिंदी।
·
कारोबारियों द्वारा नोट कमाने
की भाषा है हिंदी।
·
आज़ादी के तरानों की भाषा है
हिंदी।
·
मनोरंजन की भाषा है हिंदी।
गौरक्षा हेतु विचारणीय बिन्दु
गौरक्षा हेतु विचारणीय बिन्दु
- गाय को राष्ट्रीय
महत्व का पशु घोषित किया जाना चाहिए। हिन्दू संस्कृति में गाय का दूध अमृत
माना गया है।
- देश में
प्रत्येक गाय का स्थानीय नगरपालिका/नगर निगम में अनिवार्यत: जन्म-मृत्यु पंजीकरण
होना चाहिए ताकि गायों की सही-सही संख्या मालूम होने के साथ-साथ उनके कल्याण के
लिए योजनाएं तैयार करने में सहायता मिल सके।
- प्रत्येक
शहर/गॉंव में नगर निगम/नगरपालिका/पंचायत के स्तर पर सरकारी खर्च से कम से कम
एक-एक गौशाला होनी चाहिए।
इस गौशाला की
प्रबंधन समिति में सरकारी एवं गैर-सरकारी गणमान्य सदस्य होने चाहिएं।
गौरक्षा के
क्षेत्र में विशेष कार्य कार्य करने वाले व्यक्तियों का प्रतिनिधित्व भी इस
प्रबंध समिति में होना चाहिए।
- नगर
निगम/नगरपालिका/पंचायत आदि में पंजीकृत गायों द्वारा दूध देना बन्द करने के
बाद उन गायों के पालकों द्वारा उन गायों के साथ क्या किया गया, इसके बारे
में भी जानकारी देना अनिवार्य होना चाहिए।
- प्रत्येक
गाय पालक के लिए यह अनिवार्य होना चाहिए कि जब गाय उनके लिए लाभ की वस्तु
नहीं रह जाती है अर्थात् गाय दूध देना बन्द कर देती है तो वह गाय नगर
निगम/नगरपालिका/पंचायत या किसी स्वयं—सेवी संस्था की गौशाला को सौंपी
जाएगी।
वर्षों तक गाय से
लाभ अर्जित करने के बाद लाभांश के रूप में यथा सामर्थ्य राशि संबंधित गौशाला को
दान रूप में दी जानी चाहिए।
- चूंकि किसी
भी सरकारी/गैर-सरकारी गौशाला को चलाना आर्थिक रूप से मुश्किल हो जाता है, इसलिए लोगों
को उसके शहर/गांव की गौशाला की कोई एक गाय गोद लेने का अवसर प्रदान किया जाना
चाहिए जिसके अंतर्गत गोद लेने वाला व्यक्ति उस गाय के भरण-पोषण एवं इलाज आदि
से संबंधित खर्चों का वहन करेगा।
इसके लिए, प्रत्येक गौशाला
में प्रत्येक गाय के शरीर पर प्राकृतिक रंगों का इस्तेमाल कर पंजीकरण संख्या का
उल्लेख होना चाहिए।
यदि आवश्यक हो और
गोद लेने वाला व्यक्ति चाहे तो उस व्यक्ति के सौजन्य की जानकारी एक छोटे एवं
हल्के सूचना-पट्ट के रूप में गाय के गले में टांगी जा सकती है।
यदि कोई एक व्यक्ति
किसी एक गाय के सभी खर्च उठाने में असमर्थ रहता है तो एक व्यक्ति गाय के भरण-पोषण
यानि हरे चारे आदि का खर्च वहन कर सकता है और अन्य व्यक्ति उस गाय के इलाज खर्च
आदि का वहन कर सकते हैं।
- चूंकि केवल
सरकारी स्तर पर गौशालाओं की स्थापना और संचालन बहुत कठिन कार्य है और इसमें
समय भी अधिक लगेगा, इसलिए गौशाला स्थापित करने और उसका संचालन करने की
इच्छुक स्वयंसेवी संस्थाओं को उस तरह से कम दरों पर जमीन उपलब्ध करवानी
चाहिए जिस प्रकार स्कूल, अस्पतला, मन्दिर आदि बनाने के लिए जमीन
उपलब्ध करवाई जाती है। इसके अलावा, बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए
भी आर्थिक सहयोग दिया जाना चाहिए।
- प्रत्येक
गौशाला का नगर निगम/नगरपालिका/पंचायत में पंजीकरण होना चाहिए। ऐसी गौशालाओं
का संचालन करने वाली संस्थाएं सोसाइटी एक्ट के तहत पंजीकृत होनी चाहिए। इन
गौशालाओं को यथासंभव सरकारी अनुदान भी दिया जाना चाहिए।
- देश में केन्द्रीय
सरकार के स्तर पर गौवध को रोकने के लिए सख्त कानून बनाया जाना चाहिए। राज्य
सरकारों के लिए इस कानून को अपने-अपने राज्यों में लागू करना अनिवार्य होना
चाहिए। गौवध को गैर-जमानती अपराध बनाना चाहिए और गौवध के मुजरिमों को कम से
कम 3 वर्ष और अधिकतम 10 वर्ष की सजा होनी चाहिए।
- राष्ट्रीय
स्तर पर ‘’राष्ट्रीय गौरक्षा एवं सेवा आयोग’’ का गठन होना चाहिए। इस राष्ट्रीय आयोग
के अंतर्गत प्रत्येक राज्य एवं जिला स्तर पर क्रमश: ‘’राज्य
गौरक्षा एवं सेवा आयोग’’ और ‘’जिला गौरक्षा एवं सेवा समिति’’ का गठन किया
जाना चाहिए।
‘’राष्ट्रीय
गौरक्षा एवं सेवा आयोग’’ के अध्यक्ष माननीय प्रधानमंत्री अथवा केन्द्रीय गृह
मंत्री होने चाहिएं।
इसी तरह, ‘’राज्य गौरक्षा
एवं सेवा आयोग’’ के अध्यक्ष राज्य के मुख्यमंत्री अथवा गृहमंत्री होने चाहिएं और ‘’जिला गौरक्षा एवं
सेवा समिति’’ का अध्यक्ष वहां का सांसद या विधायक होना चाहिए।
इन आयोग एवं समिति
में वरिष्ठ सरकारी अधिकारियों एवं जनप्रतिनिधियों के अलावा गौरक्षा के क्षेत्र
में उल्लेखनीय कार्य कर चुके महानुभावों को शामिल किया जाना चाहिए।
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