Sunday, August 30, 2015

सूचना का अधिकार की ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि : राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्‍य में

सूचना का अधिकार की ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि  
(राष्‍ट्रीय एवं अंतर्राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्‍य में)

भूमिका

·        यह स्‍वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे महत्‍वपूर्ण और उपयोगी कानून है।
·        यह एक सशक्‍त (अहिंसात्‍मक) गांधीवादी हथियार है।
·        यह कानून ‘’जनता का शासन, जनता के लिए, जनता के द्वारा’’ की अवधारणा को सफल बनाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा है।
·        यह कानून सरकार को जनता के प्रति जवाबदेह बनाता है।
·        इस कानून ने प्रशासनिक व्‍यवस्‍था में निर्णय लेने की प्रक्रिया को पारदर्शी बना दिया है।
·        इस कानून ने विधानपालिका, कार्यपालिका और न्‍यायपालिका के कामकाज के प्रति लोगों के संदेहात्‍मक नज़रिये को सकारात्‍मक बनाने में महत्‍वपूर्ण भूमिका अदा की है।

 ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि : राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्‍य में

·        इस कानून मज़दूर किसान शक्ति संगठन (एम.के.एस.एल.) की क्रांतिकारी पहल का परिणाम है।
·        ग्रामीण भारत में न्‍यूनतम मज़दूरी और सरकारी बही-खातों में पारदर्शिता लाने की मजदूरों की मांग ने इस कानून को बनाने का आधार तैयार किया था।
·        मज़दूरों के इस  अभियान  को पढ़े-लिखे लोगों के स्‍वयंसेवी संगठनों ने आगे बढ़ाया।
·        वर्ष 1993 में ग्राहक शिक्षा और अनुसंधान परिषद् (सी.ई.आर.सी.), अहमदाबाद ने इस कानून का सर्वप्रथम मसौदा पेश किया था।
·        वर्ष 1996 में न्‍यायाधीश पी.बी. सावंत की अध्‍यक्षता वाली प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया ने भी इस कानून का एक मसौदा तत्‍कालीन केन्‍द्रीय सरकार के समक्ष पेश किया था।
·        न्‍यायाधीश सावंत की अध्‍यक्षता वाली प्रैस काउंसिल ऑफ इंडिया द्वारा तैयार किए गए मसौदे को अपडेट करने के बाद इसका नाम एन.आई.आर.डी. फ्रीडम ऑफ इंफार्मेशन बिल, 1997 कर दिया गया था।
·        वर्ष 1997 में तत्‍कालीन केन्‍द्रीय सरकार ने सूचना की आज़ादी पर विधेयक का मसौदा तैयार करने के लिए श्री एच.डी. शौरी की अध्‍यक्षता में एक कार्य समूह का गठन किया गया था।
·        शौरी समिति की रिपोर्ट और विधेयक का मसौदा वर्ष 1997 में प्रकाशित किया गया था।
·        शौरी समिति द्वारा तैयार विधेयक के मसौदे को तत्‍कालीन केन्‍द्रीय सरकार की कैबिनेट बैठकों में पारित किया गया था, परन्‍तु संसद में पेश नहीं किया गया था।
·        इसी बीच, तत्‍कालीन केन्‍द्रीय शहरी विकास मंत्री श्री राम जेठमलानी ने देश के नागरिकों को अपने मंत्रालय की फाइलों का निरीक्षण करने और फोटोकॉपी प्राप्‍त करने का अधिकार देने के लिए एक आदेश जारी किया था। परन्‍तु, तत्‍कालीन कैबिनेट सचिव ने इस आदेश को लागू करने की अनुमति नहीं दी थी।
·        शौरी समिति द्वारा तैयार मसौदा विधेयक में कुछ बदलाव करके इसे सूचना की आज़ादी विधेयक, 2000’ नाम दिया गया था।
·        तत्‍कालीन केन्‍द्रीय सरकार ने मसौदा सूचना का आज़ादी विधेयक, 2000  गृह मंत्रालय की संसदीय स्‍थायी समिति को भेज दिया था।
·        गृह मंत्रालय की संसदीय स्‍थाई समिति ने जुलाई, 2001 में अपनी रिपोर्ट पेश करने से पहले सिविल सोसायटी के समूहों से विचार-विमर्श किया था।
·        ‘’राष्‍ट्रीय सूचना की आज़ादी विधेयक, 2000 संसद में वर्ष 2002 में प्रस्‍तुत किया गया था।
·        ‘’राष्‍ट्रीय सूचना की आज़ादी विधेयक, 2000 संसद में दिसम्‍बर, 2002 में  पारित किया गया था।
·        जनवरी, 2003 में महामहिम राष्‍ट्रपति ने ‘’सूचना की आज़ादी अधिनियम, 2002 रूप में इसे अपनी सहमति प्रदान कर दी थी।
·        यह अधिनियम प्रभावी होने की निश्चित तारीख तक अधिसूचित नहीं किए जाने की वज़ह से वास्‍तव में लागू नहीं किया जा सका था।
·        मई, 2004 में केन्‍द्रीय सरकार में सत्‍ता परिवर्तन हुआ और एन.डी.ए. (नेशनल डेमोक्रेटिक एलायंस) की जगह यू.पी.ए. (यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस) की सरकार अस्तित्‍व में आ गई थी।
·        सूचना के अधिकार को यू.पी.ए. सरकार के न्‍यूनतम सांझा कार्यक्रम (कॉमन मिनिमम प्रोग्राम) में शामिल किया गया था।
·        तत्‍कालीन यू.पी.ए. सरकार के न्‍यूनतम सांझा कार्यक्रम के कार्यान्‍वयन की देखरेख के लिए नेशनल एडवाइज़री काउंसिल (एन.ए.सी.) का गठन किया गया था।
·        एन.ए.सी. की पहली बैठक में ही सूचना का अधिकार कानून को अंतिम  रूप देने की क़वायद शुरू कर दी गई थी।
·        इसी बीच,  सीनियर एडवोकेट प्रशांत भूषण ने ‘’नागरिक के सूचना के अधिकार पर राष्‍ट्रीय अभियान (एन.सी.पी.आर.आई.) की ओर से एक माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय में जनहित याचिका दायर करते हुए ‘’सूचना की आज़ादी अधिनियम, 2002’’ को तत्‍काल लागू किए जाने की मांग की गई थी।
·        माननीय उच्‍चतम न्‍यायालय ने इस मामले में केन्‍द्र सरकार को उसका जवाब दाखिल करने के लिए दिनांक 15 सितम्‍बर 2004 तक का समय दिया गया था।
·        इसी बीच, एन.ए.सी. ने दिनांक 14 अगस्‍त 2005 को आयोजित अपनी तीसरी बैठक में ‘’सूचना की आज़ादी अधिनियम, 2002’’ को संशोधित करने संबंधी अंतिम सिफ़ारिशों पर अपनी सहमति व्‍यक्‍त कर दी थी।
·        तत्‍पश्‍चात, एन.ए.सी. ने यह संशोधित विधेयक प्रधानमंत्री कार्यालय को भेज दिया गया था।
·        23 दिसम्‍बर 2004 को ‘’सूचना का अधिकार विधेयक, 2004’’ संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान लोकसभा में पेश किया गया था।
·        संसद ने यह विधेयक कार्मिक, जन शिकायत, विधि एवं अधिकारिता मंत्रालय की स्‍थायी समिति को विचार के लिए भेज दिया था।
·        इस स्‍थायी समिति की रिपोर्ट और प्रस्‍तावित संशोधित पाठ के साथ ‘’सूचना का अधिकार विधेयक, 2004’’ दिनांक 21 मार्च 2005 को लोकसभा को भेज दिया गया था।
·        सूचना का अधिकार संशोधन विधेयक, 2005 दिनांक 10 मई 2005 को लोकसभा में पेश किया गया था।   
·        आखिरकार, यह विधेयक लोकसभा ने दिनांक 11 मई 2005 और राज्‍यसभा ने 12 मई 2005 को  अनुमोदित कर दिया था।
·        तत्‍कालीन राष्‍ट्रपति ए.पी.जे. अब्‍दुल कलाम ने 15 जून 2005 को सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005  पर अपनी मोहर लगा दी थी।
·        केंद्रीय सरकार और राज्‍य सरकारों को यह अधिनियम पूरी तरह से लागू करने के लिए 120 दिनों का समय दिया गया था।
·        यह अधिनियम 12 अक्‍तूबर 2005 से औपचारिक रूप से जम्‍मू एवं कश्‍मीर को छोड़कर शेष भारत पर लागू किया गया था।
·        जम्‍मू एवं कश्‍मीर राज्‍य में राज्‍य विधान सभा द्वारा 5 जनवरी 2004 को पारित जम्‍मू एवं कश्‍मीर सूचना का अधिकार कानून, 2004 लागू है।

 ऐतिहासिक पृष्‍ठभूमि : अंतर्राष्‍ट्रीय परिप्रेक्ष्‍य में

·        वर्तमान में, विश्‍व के लगभग 75 देशों में भारत के आरटीआई कानून से मिलता-जुलता सूचना का अधिकार कानून अस्तित्‍व में है।
·        वर्ष 1990 में विश्‍व के केवल 13 देशों में इस तरह का कानून था।
·        भारत के पड़ोसी  देश नेपाल में यह कानून सूचना का अधिकार अधिनियम, 2064 (सम्‍वत् वर्ष) (वर्ष 2007) रूप में लागू किया गया है।
·        सूचना का अधिकार कानून अलग-अलग देशों में अलग-अलग नामों से प्रचलित हैं, जैसे –
-    दक्षिण अफ्रीकी गणतंत्र में प्रोमोशन ऑफ एक्‍सेस टू इंफर्मेशन एक्‍ट, 2000
-    ऑस्‍ट्रलिया में फ्रीडम ऑफ इंफर्मेशन एक्‍ट, 1982
-    जापान में लॉ कंसर्निंग टू इंफर्मेशन हेल्‍ड बाइ एडमिनिस्‍ट्र‍ेटिव आर्गेनाइजेशन्‍स, 1999
-    जमैका में एक्‍सेस टू इंफर्मेशन एक्‍ट, 2002
-    नार्वे में पब्लिक एक्‍सेस टू डॉक्‍यूमेंट इन पब्लिक एडमिनिस्ट्रिेशन एक्‍ट, 1970
·        कई अंतर्राष्‍ट्रीय संस्‍थाओं  जैसे – संयुक्‍त राष्‍ट्र (यू.एन.), अमेरिकी राज्‍यों के संगठन (ओ..एस.), यूरोपीय परिषद (सी.ई.) और अफ्रीकन यूनियन (ए.यू.) ने सूचना को स्‍वतंत्रता के अधिकार के मौलिक और कानूनी रूप को प्राधिकृत रूप से स्‍वीकार किया है।
·        अमेरिका, यूरोप और अफ्रीका में मानवाधिकारों की सभी तीन प्रमुख प्रणालियों ने सूचना का अधिकार के महत्‍व को औपचारिक रूप से मानवाधिकार के रूप में स्‍वीकार किया है।

·        वर्ष 2006 में एक महत्‍वपूर्ण मामले में, अंतर्राष्‍ट्रीय न्‍यायालय, अंतर-अमेरिकी मानवाधिकार न्‍यायालय द्वारा पहला ऐसा निर्णय दिया गया था कि अभिव्‍यक्ति की स्‍वतंत्रता (राइट टू एक्‍सप्रेस) के अधिकार में सार्वजनिक संस्‍थाओं के पास उपलब्‍ध सूचना प्राप्‍त करने का अधिकार शामिल है। 

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